Friday, May 12, 2006

रितुपर्ना तुम आज भी नहीं आयी

कुछ
धुधली पड गयी लकीरो को
फिर से गाढा किया...

उन पर कुछ रंग फेंके
लाल हरे नीले सफेद...

अब
कैनवस का कोई हिस्सा
खाली नही रहा.....

बडी खामोशी के साथ
उन फैले पडे रंगो को
घंटो निहारता रहा.....

अचानक,
गाढी पड चुकी लकीरे
अब अस्पस्ट नजर आने लगी...
और फिर,
पूरा का पूरा कैनवास खाली
बिल्कुल सफेद..
जैसे कभी वहा रंग थे ही नहीँ..
फ़ीकी पड चुकी लकीरेँ
अब शब्दो मे तब्दील हो गयी...

हाँ..यही शब्द तो थे.....
”रितुपर्ना तुम आज भी नहीं आयी”

5 comments:

ratna said...

कोशिशों के बाद भी मिली असफलता से उपजी निराशा का सुन्दर चित्रण ।

Udan Tashtari said...

बहुत सुंदर अभिव्यक्ति. बधाई.

समीर लाल

Pratyaksha said...

बडे दिनों बाद कविता पढी तुम्हारी. अच्छी लगी

वैसे ,रितुपर्ना कौन है विज़ ;-)

अनूप शुक्ला said...

बढ़िया । ऋतुपर्ना वही है जो आज भी नहीं आई।

प्रियंकर said...

आयेगी ! एक दिन ज़रूर आयेगी . बस आप कहते रहिएगा कि 'मेरा दर खुला है खुला ही रहेगा तुम्हारे लिये'. आप जैसे कलाकार के पास नहीं आयेगी तो कहां जाएगी ऋतुपर्णा .