इस वर्ष की डिजाईन: पुस्तकें

10:10 AM Posted by विजेंद्र एस विज

 #1. आकाश रस  - विजय शंकर | प्रकाशक - "क"  दिल्ली
 
  #2. दुबई ड्रीम्ज -शामलाल पुरी | प्रकाशक - "दुबई"  
 
#3. धूप से रूठी चांदनी  - सुधा ओंम ढींगरा | प्रकाशक - "शिवना सीहोर" 
#4. कोई दीवाना कहता है  - डा. कुमार विश्वास  | प्रकाशक - "फ्यूजन बुक्स" दिल्ली 
#5. शोर के पड़ोस में चुप सी नदी  - मनीष मिश्र  | प्रकाशक  - "हिन्द युग्म"  दिल्ली
#6. संभावना डाट कॉम  - शैलेश भारतवासी  | प्रकाशक  - "हिन्द युग्म"  दिल्ली 

#7. रोशनदान  - शन्नो अग्रवाल | प्रकाशक  - "हिन्द युग्म"  दिल्ली 
#8. तस्वीर जिन्दगी के  - मनोज भावुक | प्रकाशक  - "हिन्द युग्म"  दिल्ली 
 #9. शब्दों का रिश्ता  - रश्मि प्रभा   | प्रकाशक  - "हिन्द युग्म"  दिल्ली
                 
इन सभी किताबों के डिजाईन / आवरण कवर व इनर लेआउट हमने किये हैं...
 उम्मीद है आपको पसंद आयें..सुझाओं का स्वागत है ....

कुछ ताजी कवितायेँ...

9:16 AM Posted by विजेंद्र एस विज

हा में ही लिखीं कुछ ताजी कवितायेँ...अभी बीज बोयें हैं... वयस्क नहीं हुई हैं..ग्रो होने में समय लगेगा...

1.

कितनी बार
और मिलोगे...
थकते नहीं...
कहीं तो रुको...
तथ्य अकारण तो नहीं...
शून्यता से परे...
अनुरोध आपका
मुक्त बंधन
साधना, निर्वासन
आधूत, निमग्न
साक्षी बन
कितनी बार
और मिलोगे...

2.


















उसने निर्वासन झेला,
विस्थापन की पीड़ा थी
उसकी आँखों में...
उसने अपने शब्दों को
उस चित्र में तलाशने की
कोशिश की...
एक हल्की सी मुस्कराहट
उसके चहरे के
विस्तार को नाप गयी...

-अलीसिया पारटोनी की कविता पर
पेंटिंग बनाने के बाद लिखी...


3.

उन्होंने मुझे शामिल नहीं किया
अपनी बिरादरी में....
सभी परिभाषाओं को नकारते हुए
मैंने छलांग लगाने की कोशीश की...
तो आत्म विश्वास आड़े आ गया...
अब वह मुझे पाताल की ओर
धकेले लिए जा रहा है.....

4.

उसने पाताल से निकलकर
लिखी एक कविता....
विजय पा ली
अपने गिरते आत्म विश्वाश पर...
शून्यता से दूर
गगन में तारों के साथ
खेलने लगी...
उसने एक कविता लिख दी
संसार रच डाला...

5.

वह कुत्ते की तरह ललचाता हुआ
मेरे नजदीक आता है...
चाटने लगता है मुझे...
हिम्मत करके मैं उसे डांटता हूँ...
वह एक पल के लिए भागता है...
फिर धीरे धीरे वापस लौटता है...
उस दिन भी आया
पर मैंने उस पर विजय पा ली...
शायद मुझे रुकना आ गया...