इक पगली लडकी के बिन, कविता संग्रह, डा. कुमार विश्वास

11:56 AM Posted by विजेंद्र एस विज

तनी रंग बिरंगी दुनिया,
दो आंखो मे कैसे आये..
हमसे पूछो, इतने अनुभव
एक कंठ से, कैसे गाये.....
...तब इक पगली लडकी के बिन
जीना गद्दारी लगता है...

डा. कुमार विश्वास, नई पीढी के पसन्दीदा कवि और गीतकार हैँ..इनका नाम किसी परिचय का मोहताज नही है...अभी हाल ही मे ही उनका एक कविता संग्रह “कोई दीवाना कहता है” हिन्द प्रकाशन द्वारा प्रकाशित हुआ था..और अब पुन: उनका दूसरा एक संग्रह “इक पगली लडकी के बिन” रवि प्रकाशन ने प्रकाशित किया है...दोनो किताबो के कवर पृष्ठ मेरे द्वारा डिजाइन किये गये है.. जिन्हे यहाँ आप देख सकते है.. कविता संग्रह बाजार मे आसानी से उपलब्ध है...

जश्न-ए-आजादी

5:46 PM Posted by विजेंद्र एस विज

जश्न-ए-आजादी..
मुबारक हो..

नागार्जुन-साहित्य पर एक चित्र

5:08 PM Posted by विजेंद्र एस विज

बादल को घिरते देखा है।


अमल धवल गिरि के शिखरों पर,
बादल को घिरते देखा है।
छोटे-छोटे मोती जैसे
उसके शीतल तुहीन कणों को,
मानसरोवर के उन स्वर्णिम
कमलों पर गिरते देखा है,
बादलों को घिरते देखा है।
तुंग हिमालय के कंधों पर
छोटी बड़ी कई झीलें हैं,
उनके श्यामल नील सलिल में
समतल देशों से आ-आकर
पावस की ऊमस से आकुल
तिक्त-मधुर बिसतंतु खोजते
हंसों को तिरते देखा है।
बादल को घिरते देखा है।

- नागार्जुन

ग्राफिक्स-विज

मैने जीवित व्यक्तियो के पोट्रेट्स नही बनाये...

2:40 PM Posted by विजेंद्र एस विज

ज से लगभग 13-14 बरस बहले (सन-1993) मै इलाहाबाद संग्रहालय पहली बार गया था....पहली बार इतनी कलाकृतियाँ देखने को मिली...उन्ही मे से एक नेहरू का पोट्रेट भी था .. आयल कलर , आन बोर्ड , काफी बडा और जाने कौन सी टेक्नीक से बना...उस समय मुझे आयल कलर और टेक्नीक का इतना ज्ञान नही था...

पोट्रेट बनाने की प्रेरणा मुझे उसी चित्र से मिली....नेहरू जी के उस पोट्रेट ने मुझे 20-सो बार संग्रहालय आने पर मजबूर कर दिया... तब तक वीथिका संरक्षको द्वारा उस टेक्नीक के बारे मे भी परिचित हो चुका था..चित्र आयल कलर मे था और बिना कूची का इस्तेमाल किये हुए , नाइफ (एक चाकू जो स्पेशली पेन्टिग के लिये होता है) से बना था. ..बडा ही आश्चर्य और मन मे कौतुहल बना रहता.. क्या सालिड इफेक्ट्स था वाकई...करीब 2-3 बरस के मानसिक तनाव के बाद 1996 मे हमने एक दिन...स्केच बुक से एक पेज निकाला गाँधी के कई चित्र ड्रा किये...एक फाइनल हुआ... आयल कलर के बारे मे ज्यादा ज्ञान नही था....हाँ स्टूडेंट क्वालिटी का कैमेल वाटर कलर रखे थे ..उसी से एक्स्पेरीमेंट करना शुरू किया...वह भी सब्जी काट्ने वाले चाकू से...परिणाम चौकाने वाले थे..सस्ते वाटर कलर से एसा इफेक्ट देख तो आनन्द ही आ गया.

और इस तरह तैयार हुआ यह गाँधी का पोट्रेट....फिर 3-4 दिन बाद नेहरू का....और करीब एक साल बाद (1997) मे मेरा वह आखिरी पोट्रेट मेरी अपनी 5 बरस की बहन ‘रोशनी’ का था......


गाँधी-12 x 17, इंच, वाटर कलर, नाइफ, पेपर-1996

नेहरू -12 x17, इंच, वाटर कलर, नाइफ, पेपर-1996

रोशनी -12 x17, इंच, वाटर कलर, नाइफ, पेपर-1997

बस यही 3 सबूत है मेरे पास की मैने भी कभी पोट्रेट बनाये थे...और आज 10 बरस हो गये....


-विज