Monday, August 25, 2008

उस्ताद की याद में



टाइटल : उस्ताद की याद में
24x24 इंच | डिजिटल आन पेपर
सन -२००८, अगस्त

Thursday, August 14, 2008

Friday, June 27, 2008

अँधेरी रात का सूरज | अपकमिंग काव्य कृति - राकेश खण्डेलवाल


अँधेरी रात का सूरज
काव्य कृति - राकेश खण्डेलवाल
पुस्तक जुलाई में इंदौर से प्रकाशित हो रही है..
आवरण डिजाइन करने का सौभाग्य हमें मिल गया है..
जिसके लिये अपनी एक कलाकृति चुनी है.
आप सभी से बाँट रहे हैं...आप के सुझावों का स्वागत है.

Friday, April 18, 2008

एक शाम डॉ. अशोक चक्रधर के नाम




डॉ. अशोक चक्रधर जी का एकल काव्य-पाठ
शनिवार 19 अप्रैल 2008 को साय: 6:30 बजे सिरी फोर्ट ऑडिटोरियम न। तीन
कार्यक्रम का निमंत्रण यही है

Wednesday, April 16, 2008

यह कलाकृति डा. अशोक चक्रधर ने बनायी है


अनटाइट्ल्ड
डा.अशोक चक्रधर
18x24, इन्च, एक्रिलिक आन कैनवास्

अभी हाल ही मे उनसे मुलाकात हुई..उन्होने अपने जन्मदिन पर एक कलाकृति बनायी है..वाकई एक मास्टर पीस.. कलाकृति प्रवासी सन्सार का आवरण बनी है..इसकी खूबसूरती का अन्दाजा इसके जबर्जस्त स्ट्रोक्स, सबजेक्ट और पावरफुल कम्पोजिसन , कलर देख कर लगाया जा सकता है...
मैं शब्दों में बखान करूँगा तो बेइमानी होगी.

Tuesday, March 18, 2008

जयजयवंती साहित्य-संगोष्ठी / सातवीं कड़ी

हिन्दी का भविष्य और भविष्य की हिन्दी
जयजयवंती साहित्य-संगोष्ठी / सातवीं कड़ी
टीवी न्यूज़ में भाषा और यूनिकोड


मुख्य अतिथि
डॉ. अशोक वालिया (मंत्री, दिल्ली सरकार)

अध्यक्ष
डॉ. इंद्र नाथ चौधरी

सम्मान
वरिष्ठ पत्रकार श्री प्रभाष जोशी को
'जयजयवंती सम्मान' एवं हिन्दी सॉफ़्टवेयर 'सुविधा' सज्जित लैपटॉप

वक्तव्य (न्यूज़)
प्रोफेसर सुधीश पचौरी

वक्तव्य (यूनिकोड)
श्री पंकज राय

काव्य-पाठ
अशोक चक्रधर एंड कंपनी

आप सादर आमंत्रित हैं।


अशोक चक्रधर
(संयोजन)
अध्यक्ष, जयजयवंती
26949494, 26941616

राकेश पांडेय
(व्यवस्था)
संपादक, प्रवासी संसार
9810180765

पद्मश्री वीरेन्द्र प्रभाकर
(सहयोग)
मंत्री, चित्र कला संगम
23384760


सायं 6.30 बजे / 24 मार्च 2008 / सोमवार
गुलमोहर सभागार, इंडिया हैबीटैट सैंटर, लोदी रोड, नई दिल्ली

आतिथ्य-सौजन्य
श्री गंगाधर जसवानी

Saturday, March 01, 2008

शब्द तुम..?


शब्द तुम
कहाँ चले गये...

पता ही नहीं चला
आधी रात के बाद
कहाँ गायब हो गये...

जाने कौन से दरवाजे
तुम्हारे लिये खुलते हैं...
और,
जाने किस घर मे
अब तुम दस्तक देते हो...
तरह- तरह के स्वांग
रचाने लगे हो...
कब तक यूँ ही,
छलते रहोगे मुझे तुम...
अब तो मै,
तुम्हारी हम उम्र का हो गया हूँ...

-विज

दिव्या पांडे-एकल शो






दिव्या पांडे-एकल शो
ललित कला अकादमी-मंडी हाउस
मार्च-5 से 11, 2008 तक, समय 10 से 6
देखना ना भूलें
स्वागत है...

Thursday, February 14, 2008

ताज महोत्सव-2008

ताज महोत्सव, 2008



18th-27th, Feb, 2008, आगरा.
अधिक जानकारी के लिये यह वीडियो देखें.
या फिर वेबसाइट पर जायें.
www.tajmahotsav.in

Tuesday, January 15, 2008

शाम-ए-वतन-एक शाम पंकज उधास के नाम्



गज़ल और शायरी के दीवानों के लिये
एक शाम वतन के नाम ...
शाम-ए-गज़ल को सवांर रहे हैं
पंकज उधास
और
शाम-ए-शायरी को सवांर रहे हैं
जनाब राहत इन्दौरी
जनाब निदा फाज़ली
जनाब मुनव्वर राना साहेब
मंच संचालन
डा कुमार विश्वास
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जहग है
सीरी फोर्ट आडीटोरियम
अगस्त क्रांती मार्ग, खेलगांव, नई दिल्ली -49
और समय है
सांय 6 बजे , 19 जनवरी 2008
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अधिक जानकारी नीचे दिये पते पर ..
http://onest.in/watan
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Tuesday, October 02, 2007

गजल-बीती-एक अदब की शाम- एक शार्ट फिल्म की कोशिश-एक रपट मुनव्वर राना पर


किसी को घर मिला हिस्से मे, या कोई दुकां आयी,
मैं घर मे सबसे छोटा था, मेरे हिस्से मे मां आयी।

23 सितंबर 2007, बडी अदब और तहजीब से सराबोर शाम थी.. कृभको सभागार नोयडा मे कैसे गुजरी पता ही नही चला. कई दिनों से हम सब तैयारी मे लगे थे..समय कम था. पर सब ठीक हुआ.. और आनेस्ट इंटरटेनमेंट ने अपने पहले प्रोग्राम की सफलता का झंडा लहरा ही दिया.
सभी ने अपनी-अपनी जिम्मेवारी बडी बखूबी निभाई. जो मेरे हिस्से था वह यहाँ आप सभी से बाँट रहा हूँ.

गजल-बीती एक मुशायरा ना होकर भी अधिकांश मुशायरों और एक गजल संध्या से ज्यादा बेहतर था. कार्यक्रम मुनव्वर राना साहब की अदब पर था... गजल को कोठो- कोठियों, महलो और हरम के बीच से निकाल कर आम आदमियों के बीच पहुचाने का श्रेय जिन शायरों को जाता है..राना साहब उनमे से एक हैं.

“खुद से चलकर नहीं ये तर्जे सुखन आया है, पांव दाबे हैं बुजुर्गों के तो ये फन आया है..”




उन्होने अपनी बेहतरीन रचनायें सुनाकर श्रोताओं को सराबोर कर दिया..कुछ शेर मैं यहाँ दे रहा हूँ..
“सियासत किस हुनर मंदी से सच्चाई छुपाती है,
जैसे दुल्हन कि सिसकियों को शहनाई छुपाती है।
चाहती है कुछ दिन और माँ को खुश रखना,
ये बच्ची कपङों से अपनी लम्बाई छुपाती है।

उनकी यह रचना भी सराही गई-

ये सर बुलंद होते ही शाने से कट गया,
मैं मोहतरम
हुआ तो जमाने से कट गया।
इस पेङ से किसी को शिकायत नहीं थी,

यह पेङ तो बीच में आने से कट गया।


उन्हे सुनना गुलशन की सैर करने जैसा था..जिसमे अलग-अलग बू के कई रंग खिले हैं.
उन्होंने सिंधु नदी पर अपनी प्रसिद्ध कविता भी पढी...

“यह नदी गुजरे जहाँ से समझो हिन्दुस्तान है”

और माँ कि महानता को इन शब्दों मे व्यक्त किया।

“बुलंदियों का बङे से बङा निशान हुआ,
उठाया गोद में माँ ने तो आसमान हुआ”

जिन्दगी भर हमने यूँ खाली मकां रहने दिया,
तुम गये तो दूसरे को कब यहाँ रहने दिया।

बनावटी और खोखले व्यवहार पर उन्होने लिखा है...

“मैं फल देखकर लोगों को पहचानता हूँ,
जो बाहर से ज्यादा मीठे हों, अंदर से सङे होते हैं।“


अभिनेता राजबब्बर ने भी राना साहब की कुछ गजलें अपने खास अभिनय अन्दाज मे पढी..




”मियां मैं शेर हूँ शेरों कि गुर्राहट नहीं जाती,
लहजा नर्म भी कर लूं तो झुंझलाहट नहीं जाती”।

कवि प्रदीप चौबे की कविअताओं से हंसी के ठहाके लगते रहे..





हसन काज़मी साहब ने बेहतरीन शेर पेश कर अपनी उपस्थिती दर्ज कराई, अपने इस शेर से उन्होने लोगों तक अपनी बात पहुंचाई....


”क्या जमाना है कभी यूं भी सजा देता है,
मेरा दुश्मन मुझे जीने की दुआ देता है.

“गांव लौटे शहर से तो सादगी अच्छी लगी,
हमको मिट्टी के दिये की रोशनी अच्छी लगी”

अलीगढ से आयीं युवा शायरा मुमताज नजीम की गजलों ने श्रोताओं को मदहोश कर दिया, उन्होने कहा..
“तेरा हुक्म हो तो तमाम शब मैं तेरे सिरहाने खडी रहूं,
अगर तू कहे तो जिन्दगी तेरे पायताने गुजार दूं ।


“जब से इकरार कर लिया हमनें,

खुद को बीमार कर लिया हमनें,

अब तो लगता है जान जायेगी,

तुमसे जो प्यार कर लि
या हमने ।

मदन मोहन दानिस की रचनाओ ने भी श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया..

कार्यक्रम के संचालन की बागडोर डा. कुमार विश्वास जी के हाथों मे थी...उनका सफल संचालन और काव्य पाठ सुनने देखने का मौका पहली बार मुझे मिला..बडा अदभुत अनुभव रहा.




प्रोग्राम के डिजाइन से सम्बन्धित कार्य मेरे जिम्मे था.. आमंत्रण पत्र, बैकड्राप, मिमेंटो और एक शार्ट फिल्म.. जिसके लिये अपनी एक कलाकृति चुनी..और काफी हद तक सफल रहा. कभी सोचा भी नहीं था कि राना साहेब के इस प्रोग्राम पर मेरा एक अहम किरदार होगा.. बडे सम्मान की बात है मेरे लिये.. कि मैने उन पर काम किया. रिसोर्स कम थे.. और समय भी... 3 दिन की मेहनत और आखिरी 8 घंटे का काम करना काफी सफल रहा.. प्रोग्राम शुरू होने से मात्र 30 मिनट पहले डा. कुमार को यह फिल्म सौपी गयी..



9 मिनट और 38 सेकंड की यह फिल्म डी.वी.डी. क्वालिटी की है. जिसे प्रोजेक्टर पर देखा जा सकता है. इसे यहाँ दे रहा हूँ..उम्मीद है आप सभी को यह प्रयास पसन्द आयेगा.



-विज
www.vijendrasvij.com

Thursday, September 20, 2007

गजल बीती-एक शाम मुनव्वर राणा के नाम


शाम मुनव्वर राणा साहेब के नाम..
23 सितम्बर 2007, क़ृभको आडिटोरियम,
-10, नोयडा, समय शाम 6 बजे.
आप सभी सादर आमंन्त्रित हैं.


Tuesday, August 21, 2007

इक पगली लडकी के बिन, कविता संग्रह, डा. कुमार विश्वास

तनी रंग बिरंगी दुनिया,
दो आंखो मे कैसे आये..
हमसे पूछो, इतने अनुभव
एक कंठ से, कैसे गाये.....
...तब इक पगली लडकी के बिन
जीना गद्दारी लगता है...

डा. कुमार विश्वास, नई पीढी के पसन्दीदा कवि और गीतकार हैँ..इनका नाम किसी परिचय का मोहताज नही है...अभी हाल ही मे ही उनका एक कविता संग्रह “कोई दीवाना कहता है” हिन्द प्रकाशन द्वारा प्रकाशित हुआ था..और अब पुन: उनका दूसरा एक संग्रह “इक पगली लडकी के बिन” रवि प्रकाशन ने प्रकाशित किया है...दोनो किताबो के कवर पृष्ठ मेरे द्वारा डिजाइन किये गये है.. जिन्हे यहाँ आप देख सकते है.. कविता संग्रह बाजार मे आसानी से उपलब्ध है...

Tuesday, August 14, 2007

जश्न-ए-आजादी

जश्न-ए-आजादी..
मुबारक हो..

Monday, August 13, 2007

नागार्जुन-साहित्य पर एक चित्र

बादल को घिरते देखा है।


अमल धवल गिरि के शिखरों पर,
बादल को घिरते देखा है।
छोटे-छोटे मोती जैसे
उसके शीतल तुहीन कणों को,
मानसरोवर के उन स्वर्णिम
कमलों पर गिरते देखा है,
बादलों को घिरते देखा है।
तुंग हिमालय के कंधों पर
छोटी बड़ी कई झीलें हैं,
उनके श्यामल नील सलिल में
समतल देशों से आ-आकर
पावस की ऊमस से आकुल
तिक्त-मधुर बिसतंतु खोजते
हंसों को तिरते देखा है।
बादल को घिरते देखा है।

- नागार्जुन

ग्राफिक्स-विज

Tuesday, August 07, 2007

मैने जीवित व्यक्तियो के पोट्रेट्स नही बनाये...

ज से लगभग 13-14 बरस बहले (सन-1993) मै इलाहाबाद संग्रहालय पहली बार गया था....पहली बार इतनी कलाकृतियाँ देखने को मिली...उन्ही मे से एक नेहरू का पोट्रेट भी था .. आयल कलर , आन बोर्ड , काफी बडा और जाने कौन सी टेक्नीक से बना...उस समय मुझे आयल कलर और टेक्नीक का इतना ज्ञान नही था...

पोट्रेट बनाने की प्रेरणा मुझे उसी चित्र से मिली....नेहरू जी के उस पोट्रेट ने मुझे 20-सो बार संग्रहालय आने पर मजबूर कर दिया... तब तक वीथिका संरक्षको द्वारा उस टेक्नीक के बारे मे भी परिचित हो चुका था..चित्र आयल कलर मे था और बिना कूची का इस्तेमाल किये हुए , नाइफ (एक चाकू जो स्पेशली पेन्टिग के लिये होता है) से बना था. ..बडा ही आश्चर्य और मन मे कौतुहल बना रहता.. क्या सालिड इफेक्ट्स था वाकई...करीब 2-3 बरस के मानसिक तनाव के बाद 1996 मे हमने एक दिन...स्केच बुक से एक पेज निकाला गाँधी के कई चित्र ड्रा किये...एक फाइनल हुआ... आयल कलर के बारे मे ज्यादा ज्ञान नही था....हाँ स्टूडेंट क्वालिटी का कैमेल वाटर कलर रखे थे ..उसी से एक्स्पेरीमेंट करना शुरू किया...वह भी सब्जी काट्ने वाले चाकू से...परिणाम चौकाने वाले थे..सस्ते वाटर कलर से एसा इफेक्ट देख तो आनन्द ही आ गया.

और इस तरह तैयार हुआ यह गाँधी का पोट्रेट....फिर 3-4 दिन बाद नेहरू का....और करीब एक साल बाद (1997) मे मेरा वह आखिरी पोट्रेट मेरी अपनी 5 बरस की बहन ‘रोशनी’ का था......


गाँधी-12 x 17, इंच, वाटर कलर, नाइफ, पेपर-1996

नेहरू -12 x17, इंच, वाटर कलर, नाइफ, पेपर-1996

रोशनी -12 x17, इंच, वाटर कलर, नाइफ, पेपर-1997

बस यही 3 सबूत है मेरे पास की मैने भी कभी पोट्रेट बनाये थे...और आज 10 बरस हो गये....


-विज

Monday, July 09, 2007

सृजन शिल्पी के सवाल मेरे जवाब...

आज सृजनशिल्पी जी की पोस्ट “कला, कलाकार और कल्पना" href="http://srijanshilpi.com/?p=131">कला, कलाकार और कल्पना” पढी...
बडा ही सकरात्मक लेख है...
अभी पिछले हफ्ते उनसे गूगल पर बातचीत हुई...जिसके कुछ अंश उन्ही से इजाजत लेकर यहाँ दे रहा हूँ...कला, कलाकार और उसकी कल्पना के बारे मे उन्होने मुझसे कुछ दिलचस्प सवाल किये...जिनके उत्तर मै यहाँ लिख रहा हूँ....कितनी सफलता मुझे मिली है...वह तो आप ही बता सकेगे...


srijanshilpi: अपने अगले लेख के संदर्भ में, आपकी एक टिप्पणी चाहता हूं

srijanshilpi: कलाकार, अपनी कला में यथार्थ और कल्पना के बीच समन्वय किस प्रक्रिया के तहत करता है
12:08 PM आप इस प्रश्न को अपने हिसाब से समझ सकते हैं

12:09 PM srijanshilpi: और अपने अनुभव से कुछ बताइए

srijanshilpi: किताबी संदर्भ तो मेरे पास पर्याप्त है

12:11 PM srijanshilpi: जैसे किसी बच्चे या फूल को हम रोज देखते हैं और उसे सामने देखकर वैसी कोई प्रतिक्रिया हमपर नहीं होती जो उसी बच्चे या फूल या दृश्य की पेंटिंग को देखकर होती है तो कलाकार यथार्थ में ऐसा क्या और कैसे जोड़ता है जो उसे एक कला में रूपांतरित कर देता है
srijanshilpi: इस सप्ताहांत तक मेरे प्रश्न के संदर्भ में यदि आप कुछ प्रकाश डाल सकें तो उसे अपने लेख में समाहित करने का प्रयास करूंगा

बडे ही दिलचस्प सवाल है आपके, इससे आपकी कला मे गहरी दिल्चस्पी का भी पता लगता है....
आपके प्रश्नो के उत्तर देने की मेरी एक कोशिश भर है....

“कलाकार, अपनी कला में यथार्थ और कल्पना के बीच समन्वय किस प्रक्रिया के तहत करता है”

मेरी नजर मे कोई विषेश व्यक्ति ही कलाकार नही होता...( यहाँ जब बात चल रही है चित्रकला से सम्बन्धित है तो मै चित्रकार के बारे मे कर रहा हूँ..)

”कलाकार तो सभी होते है...सजीवो मे सृजन करने और व्यक्त करने की क्षमता होती है....फर्क सिर्फ इतना है कि किसी का गोला गोल, तो किसी का गोला चौकोर होता है....यदि रियाज किया जाये तो चौकोर गोला भी गोल हो सकता है...”

यथार्थ, को सामने रखकर ही कुछ कल्पनाये की जाती है...जैसे कभी भी कोई चीज सम्पूर्ण नही होती और हम उसकी सम्पूर्णता के लिये कल्पनाये करते है...हाँ यह जरूरी नही कि हमारी कल्पनाओ को सही दिशा मिल जाये..

एक चित्रकार की भी यही कोशिश होती है कि वह कल्पनाओ को उनका ही एक आकार दे सके, अपनी दृष्टि दे सके..... एक आइना दे सके...फिर हम उन रोज मर्रा की चीजो को उसकी नजर से देखते है तो वह खास बन जाती है..खूबसूरत लगने लगती है..और हम अनायास ही उन्हे देख कर कुछ कह उठते है....या यह कहेँ प्रतिक्रियाये जन्म लेती है...

srijanshilpi: जैसे किसी बच्चे या फूल को हम रोज देखते हैं और उसे सामने देखकर वैसी कोई प्रतिक्रिया हमपर नहीं होती जो उसी बच्चे या फूल या दृश्य की पेंटिंग को देखकर होती है तो कलाकार यथार्थ में ऐसा क्या और कैसे जोड़ता है जो उसे एक कला में रूपांतरित कर देता है....

मेरे खयाल से आपके इस प्रश्न के भी मै करीब आ गया हूँगा...

”ठीक वैसे ..जैसे हम किसी चीज कैलेंडर को देखते है..या कोई फोटो...या जैसा आपने कहा..किसी बच्चे , फूल को देखते है... जो हू...बहू दिखे...हम पर वाकई कोई विषेश प्रतिक्रिया नही होती...बनिस्पत अगर हमे उसकी पेंटिंग को देख होती है...तो यहाँ भी वही बात है.. हम यथार्थ को कल्पनाओ के साथ देखते है...और अपनी दृष्टि देते है.. हममे उस पेंटिंग को देख स्रज़नात्मक् क्षमता, कल्पनाये और दृष्टिकोण एकसाथ मिल जाते है..तभी शायद प्रतिक्रियाये जन्म लेती होंगी....

चित्रकार यथार्थ के उन पहलुओ को उजागर करता है जिन्हे हम देख नही पाते या देखने की कोशिश नही करते..या देख कर भी अनदेखा कर देते है....और फिर् हम उन्ही चीजो को चित्रकार की नजर से देखते है...या किसी कलाकृति के माध्यम से देखते है.. तो उन मामूली सी दिखने वाली चीजो मे भी खूबसूरती नजर आती है....क्यूँकि तब हम उनके सभी पहलुओ को एकसाथ देख पाते है..

“क़ूडे के ढेर से सिर्फ बदबू ही आती है... यह यथार्थ है...
क़ूडे के ढेर से सिर्फ बदबू ही नही आती है.. और भी कुछ होता है... यदि उन्हे आकार दे तो ...वह खूबसूरत लगेगी...... यह एक कोरी कल्पना है....

“आपने चित्रकार की नजर से कचरे का ढेर देखा.... उस कचरे मे बडी सारी चीजे थी...जैसे सडे कागज, खाना, बरसाती ...पुरानी घिसी पिटी चप्पल.......
अहा, क्या रंग है चप्पल का.... शायद हवाई चप्पल है... गुलाबी रंग की होती तो और खूबसूरत लगती....अभी पूरी टूटी नही......जुडी होती या फिर पूरी टूटी होती तो और भी खूबसूरत दिखती....अरे, कूडे के ढेर को यहाँ से देखो .....नीला आसमान साफ नजर आ रहा है उसके बैकग्राउंड् मे....और डूबते हुए सूरज की हल्की रोशनी टूटे चप्पल पर भी पड रही है...सुनहला लगने लगा है.... कचरे का ढेर तो एक विशाल पहाड जैसा.. ..क्या चित्र बन रहा है... चलो फिर मन मे इसे एक आकार देते है....क्या गजब का चित्र बना है...”
शायद, ऐसे ही रची जाती होंगी कलाकृतियाँ....

"लियनार्दो की मोनालिसा भी ऐसे ही रची गई होगी...
क्या थी, एक जीती जागती हमारी ही जैसी आँख नाक पैर वाली आम इंसान ही...तो हम क्युँ न् देख सके उसकी खूबसूरती को.. लियनार्दो ने ही क्यो देखा...उसी ने हमे उसकी खनकती/ मुस्कुराती हँसी दिखाई...उसकी मुस्कुराहट् का राज, उसकी आंखो की गहराई...और वह तमाम अनदेखे पहलू भी दिखाये थे...मोनालिसा कोई भी हो सकती है... अभी भी यहाँ हो सकती है...फर्क यही है कि हम उसे देख नही पा रहे... बरसो पहले ही दिखी थी लियनार्दो को... हमे फिर से दिख सकेगी..यदि हम यथार्थ के साथ अपनी कल्पनाओ के रंग भर देंगे."



यह मेरे अपने व्यक्तिगत विचार है..मेरी अपनी सोच... दावा नही....सभी की अपनी-अपनी विचारधाराये हो सकती है.....उम्मीद है, आपके पूछे गये प्रश्नो के उत्तर मिल गये होंगे....
और, सच बात तो यह है कि इन सभी सवालो के जवाब... एक चित्रकार नही...उसकी कला के कद्रदान बखूबी दे सकते है......जिसने महसूस किया होगा...असल उत्तर वही होंगे.....

-विज

Friday, July 06, 2007

अक्सर, मौसमो की छत तले

किसी मौसम में
एक इतिहास
मैं भी रचना चाहता था...

कभी बारिश की
बून्दों की टपटप के बीच
तो कभी,
हरी, पीली, बसंती
सरसों के साथ....
और,
कभी लपकाती हुई तारकोली
दिल्ली की सड़कों में
आवारा बन....

हाँ,
एक मौसम चला था
मेरे साथ भी,
कुछ पल....
सर्द कोहरे की धुन्ध मे
लिपटा हुआ....

अलसाई हुई,
सुबहो के साथ
एक दिन,
करवट बदली थी इतिहास ने.....

अपनी कँपकपाती हुई
उंगलियों के बीच फँसी
उस अधजली सिगरेट के
दो कश लिए थे...बस
तभी,
दूर कहीं कोहरे में गुम
उसकी...
सफेद आकृति ने
करीब आकर साँस ली...
और,
कर गयी स्तब्ध....

ठगा सा देखता रहा
उसे, यूँ ही....
उंगलियों की जलन ने
आभास कराया मुझे,
मेरे अपने
वहाँ होने का....

कितने मौसमो की उम्र
साथ लिये...
जिये थे वह
हसीन से लम्हे
मैने...

अब तो,
पीले पत्तों का मौसम
जा चुका है.....
बावजूद इसके....
कभी बन ना सका मै,
उसके प्रेम का
कोई भी एक हिस्सा...

और,
दूर खड़े देखता रहा
बस यूँ उसे,
किसी और का इतिहास बनते....

अक्सर,
मौसमो की छत तले
आज भी वह,
बेहद याद आती है......

-विज
( नवम्बर 2004. मे लिखी गयी एक पुरानी कविता)