कहाँ गए आखिर ..बीच के.. उनतीस-तीस पेज...

3:04 PM Posted by विजेंद्र एस विज

रसे के बाद आज अचानक ही कुछ ख़याल जेहन में उभर आये.. बड़े ही चटक हैं.. कहते हैं यादें अक्सर धुंधली हो जाती हैं..लेकिन यह तो दिनोदिन और चटक होती जा रहीं हैं... हम बदल गएँ हैं.. लेकिन भाषा वही है और लोग भी.. बस वक्त काफी आगे चला गया है महज ३० बरस आगे.... इन यादों को शब्द देने की कोशिश भर की है.. लय तो उतनी नहीं आ पायी है.. हाँ कविता समझ सकते हैं या फिर ख़याल... या कहानी गढी जा सकती है…

वहां के पेडों में,
सावन के झूले नहीं पड़ते..
सब सूख गए हैं..
अब कोई लम्बी पेंगे नहीं भरता..

वहां की औरतें
बारिश के दिनों में बरसाती ओढे हुए
धान लगाते समय अब कोरस नहीं गातीं...
सब कुछ बदल गया है..

किसी के भी चौपाल पर
शाम होते ही आल्हा के सुर नहीं उठते...
और,
ना ही किसी भी मौके में मोछई के..
एलपी की वह धुन..."ये गोटेदार लहंगा निकलूं जब डाल के..."

भिक्खू कुम्हार का चाक अब नहीं चलता
और न ही उसका आवाँ सुलगता..
सैरा गाना भी उसने बंद कर दिया है..
दूर-दूर तक कहीं खेत नजर नहीं आते ..
और न ही आम महुए के पेड़...

बदौव्वा बगहा भी अब उजड़ चुका है..
जैसे कभी वहां था ही नहीं..
उस ठूठ हो चुके बड़े बरगद से
वहां बगहा के होने का अनुमान लगता है..

अब कहीं भी गायों का झुंड नहीं दीखता
कोई भी औरत गोबर लीपती नजर नहीं आती..
और न ही,
बिशेशर अब बारिश में अपनी टपकती छत दबाता है..

कोल्ल्हौर तो अब कहीं रहे ही नहीं..
ऊंख का कहीं नाम निशान ही नहीं रहा..
गुड़ की महक अब कहीं से नहीं उठती
और न ही केशन राब का शरबत पीता...

छिटुवा की महतारी अब उसे खेत में खाना देने नहीं जाती..
कल्लू भुन्जवा अब भाड़ नहीं जलाता ...
उसके मकान की जगह सजीवन ने
पान की गुमटी खोल ली है..

शादियों में बाद्द-दार बीन नहीं बजाते
और ना ही निकाशी के समय दूल्हा कल्लू भुन्जवा के भाड़ तक जाता..
बन्ने तो अब गाये ही नहीं जाते..
पालकी भी कहीं नजर नहीं आती..
बारातों में रोशनी के लिए हंडे नहीं जलते..
और ना ही रवाइशों का इस्तेमाल होता..

रामकेश की मेहरिया गाँव की परधान नहीं रही..
बिरजा-दादा की चौपाल में ताश के पत्ते नहीं खेले जाते ..
गंगापारी की आवाज पूरे गाँव में नहीं गूंजती
और ना ही, जैराम अब अपनी एक-नाली बन्दूक साफ़ करता..

पप्पू अब जमनी खाने मर्दनपुर नहीं जाता
और न ही ललुवा भैंस को पानी पिलाने कच्चे ताला आता..
रजुवा अब कहीं दिखाई नहीं देती
रमकन्ना अब उससे चुहल-बाजी करने नहीं आता..
बैजनाथ के दुवारे अब नौटंकी नहीं होती..
और ना ही दंगलवा बगहा में अब दंगल लगता..

बजरंगी मास्टर ने पढाना बंद कर दिया है..
जगदेव मास्टर अब रहा ही नहीं..
सुमन और रेनू अपने घर के पिछवाड़े खड़ी नहीं होतीं
परधान और रेखा अब कोइला में नहीं मिलते ..

पराग लोहार के दुवारे वाले कुएं से जमना पानी लेने नहीं आती..
और ना ही शीला कमलेश से मिलने जाती..
ननकी काकी घर-घर हाल पूछने नहीं आती..
खटमलुवा तो अब कहीं नहीं दिखती..
लालमन कह रहा था की 10 बरस पहले शहर में दिखी थी......

……………………………

अब और नहीं..
बड़े ही सवाल जेहन में उभर कर आ रहे थे ..
चलचित्र की भांति ...
शायद, यादें हसीन ख्वाब बन गयीं हैं..

कुछ भी नहीं रहा अब,
…रघुबर काका की बुझी सी आवाज कानों में पडी..
कौन सा पेज पढ़ रहे हो बच्चा..?..
यह तो पेज नम्बर पांच की चीजे हैं..
पैंतीस में कैसे दिखेंगी....

हंसीन ख्वाब अब जमीन पर आ गए थे..

हाँ काका…
कहाँ गए आखिर ..बीच के.. उनतीस-तीस पेज...

8 comments:

  1. अविनाश वाचस्पति said...

    तब टी वी भी
    नहीं पहुंचा होगा वहां
    टी बी बनकर
    न गूंजा होगा
    मोबाइल
    उबलती धुन लेकर।

    वो गांव गांव था
    यह गांव नेट है
    नेट सिर्फ रूपया
    नहीं है, यहां
    रिश्‍ते भी नेट हैं
    ऐसे नेट के जाल
    हैं भरपूर माया के
    सवाल हैं चहुं ओर।

  2. Mired Mirage said...

    बहुत सुन्दर! बीता हुआ समय इतना आकर्षित करता है जबकि तब भी लोग बीते समय का ही गुणगान करते रहे होंगे। वैसे आजकल सबकुछ कुछ अधिक जल्दी ही बीत जाता है।
    घुघूती बासूती

  3. Yogendra Art Vibration said...

    sach mai sab kuch badal gaya aap sahi farmate hai prabhu.. rachna shilta yahi shidh ho jaati hai ki aap jivan ko bahuaayami rup mai dekhte ho apni dhrasti se jo pathak ko bhi rachna sansar mai le jaata hai dhundhli yaado mai le jaata hai..attit mai le jaata hai ya yun kahu ki bachpan mai le jaata hai to atisyokti nahi hogi.. aap ki rachanashilta ko mera sadhuwad..

  4. सुशील कुमार छौक्कर said...

    विजेन्द्र जी सच कहूँ तो दिल खुश हो गया। ऐसा लग रहा था मैं अपने बचपन में घूम रहा हूँ।

  5. राकेश खंडेलवाल said...

    विजेन्द्र,

    एक अंतराल के बाद पढ़ा . बहुत सुन्दर लिखा है. बधाई स्वीकारें अपनी रचनात्मकता के लिये.

  6. लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

    विजेन्द्र ,
    कलाकार हो ना ..पूरा कैनवास मय सारे रँगोँ के कैद का लिया है इस कविता मेँ
    हो सके तो अपने स्वर मेँ रेकार्ड करके , मुझे लिन्क भेज दो ..
    हिन्दी युग्म के कवि सम्मेलन मेँ शामिल करनी है ..
    बहुत अच्छी लगी ये कविता ..
    जीते रहो, खुश रहो ,
    स स्नेह,
    - लावण्या

  7. अनूप भार्गव said...

    कितना आगे बढ गये हैं लेकिन कितना अच्छा पीछे छोड़ आये हैं ....
    सुन्दर कविता के लिये बधाई ।
    एक अन्तराल के बाद तुम्हें पढना अच्छा लगा ।

  8. Anand said...

    boss yahi to life hai, aap jis time ki baat kr rahe hain, shayed us time bhi log eaisi hi baat krte haon. ki kanga gaye.... isme koi shak nahi ki kavita bahut sundr hai. aur ek vidaan hai ki har samae ke log hahi kehte hain ki kanha gaya wo...