Friday, June 27, 2008

अँधेरी रात का सूरज | अपकमिंग काव्य कृति - राकेश खण्डेलवाल


अँधेरी रात का सूरज
काव्य कृति - राकेश खण्डेलवाल
पुस्तक जुलाई में इंदौर से प्रकाशित हो रही है..
आवरण डिजाइन करने का सौभाग्य हमें मिल गया है..
जिसके लिये अपनी एक कलाकृति चुनी है.
आप सभी से बाँट रहे हैं...आप के सुझावों का स्वागत है.

Friday, April 18, 2008

एक शाम डॉ. अशोक चक्रधर के नाम




डॉ. अशोक चक्रधर जी का एकल काव्य-पाठ
शनिवार 19 अप्रैल 2008 को साय: 6:30 बजे सिरी फोर्ट ऑडिटोरियम न। तीन
कार्यक्रम का निमंत्रण यही है

Wednesday, April 16, 2008

यह कलाकृति डा. अशोक चक्रधर ने बनायी है


अनटाइट्ल्ड
डा.अशोक चक्रधर
18x24, इन्च, एक्रिलिक आन कैनवास्

अभी हाल ही मे उनसे मुलाकात हुई..उन्होने अपने जन्मदिन पर एक कलाकृति बनायी है..वाकई एक मास्टर पीस.. कलाकृति प्रवासी सन्सार का आवरण बनी है..इसकी खूबसूरती का अन्दाजा इसके जबर्जस्त स्ट्रोक्स, सबजेक्ट और पावरफुल कम्पोजिसन , कलर देख कर लगाया जा सकता है...
मैं शब्दों में बखान करूँगा तो बेइमानी होगी.

Tuesday, March 18, 2008

जयजयवंती साहित्य-संगोष्ठी / सातवीं कड़ी

हिन्दी का भविष्य और भविष्य की हिन्दी
जयजयवंती साहित्य-संगोष्ठी / सातवीं कड़ी
टीवी न्यूज़ में भाषा और यूनिकोड


मुख्य अतिथि
डॉ. अशोक वालिया (मंत्री, दिल्ली सरकार)

अध्यक्ष
डॉ. इंद्र नाथ चौधरी

सम्मान
वरिष्ठ पत्रकार श्री प्रभाष जोशी को
'जयजयवंती सम्मान' एवं हिन्दी सॉफ़्टवेयर 'सुविधा' सज्जित लैपटॉप

वक्तव्य (न्यूज़)
प्रोफेसर सुधीश पचौरी

वक्तव्य (यूनिकोड)
श्री पंकज राय

काव्य-पाठ
अशोक चक्रधर एंड कंपनी

आप सादर आमंत्रित हैं।


अशोक चक्रधर
(संयोजन)
अध्यक्ष, जयजयवंती
26949494, 26941616

राकेश पांडेय
(व्यवस्था)
संपादक, प्रवासी संसार
9810180765

पद्मश्री वीरेन्द्र प्रभाकर
(सहयोग)
मंत्री, चित्र कला संगम
23384760


सायं 6.30 बजे / 24 मार्च 2008 / सोमवार
गुलमोहर सभागार, इंडिया हैबीटैट सैंटर, लोदी रोड, नई दिल्ली

आतिथ्य-सौजन्य
श्री गंगाधर जसवानी

Saturday, March 01, 2008

शब्द तुम..?


शब्द तुम
कहाँ चले गये...

पता ही नहीं चला
आधी रात के बाद
कहाँ गायब हो गये...

जाने कौन से दरवाजे
तुम्हारे लिये खुलते हैं...
और,
जाने किस घर मे
अब तुम दस्तक देते हो...
तरह- तरह के स्वांग
रचाने लगे हो...
कब तक यूँ ही,
छलते रहोगे मुझे तुम...
अब तो मै,
तुम्हारी हम उम्र का हो गया हूँ...

-विज

दिव्या पांडे-एकल शो






दिव्या पांडे-एकल शो
ललित कला अकादमी-मंडी हाउस
मार्च-5 से 11, 2008 तक, समय 10 से 6
देखना ना भूलें
स्वागत है...

Thursday, February 14, 2008

ताज महोत्सव-2008

ताज महोत्सव, 2008



18th-27th, Feb, 2008, आगरा.
अधिक जानकारी के लिये यह वीडियो देखें.
या फिर वेबसाइट पर जायें.
www.tajmahotsav.in

Tuesday, January 15, 2008

शाम-ए-वतन-एक शाम पंकज उधास के नाम्



गज़ल और शायरी के दीवानों के लिये
एक शाम वतन के नाम ...
शाम-ए-गज़ल को सवांर रहे हैं
पंकज उधास
और
शाम-ए-शायरी को सवांर रहे हैं
जनाब राहत इन्दौरी
जनाब निदा फाज़ली
जनाब मुनव्वर राना साहेब
मंच संचालन
डा कुमार विश्वास
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जहग है
सीरी फोर्ट आडीटोरियम
अगस्त क्रांती मार्ग, खेलगांव, नई दिल्ली -49
और समय है
सांय 6 बजे , 19 जनवरी 2008
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अधिक जानकारी नीचे दिये पते पर ..
http://onest.in/watan
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Tuesday, October 02, 2007

गजल-बीती-एक अदब की शाम- एक शार्ट फिल्म की कोशिश-एक रपट मुनव्वर राना पर


किसी को घर मिला हिस्से मे, या कोई दुकां आयी,
मैं घर मे सबसे छोटा था, मेरे हिस्से मे मां आयी।

23 सितंबर 2007, बडी अदब और तहजीब से सराबोर शाम थी.. कृभको सभागार नोयडा मे कैसे गुजरी पता ही नही चला. कई दिनों से हम सब तैयारी मे लगे थे..समय कम था. पर सब ठीक हुआ.. और आनेस्ट इंटरटेनमेंट ने अपने पहले प्रोग्राम की सफलता का झंडा लहरा ही दिया.
सभी ने अपनी-अपनी जिम्मेवारी बडी बखूबी निभाई. जो मेरे हिस्से था वह यहाँ आप सभी से बाँट रहा हूँ.

गजल-बीती एक मुशायरा ना होकर भी अधिकांश मुशायरों और एक गजल संध्या से ज्यादा बेहतर था. कार्यक्रम मुनव्वर राना साहब की अदब पर था... गजल को कोठो- कोठियों, महलो और हरम के बीच से निकाल कर आम आदमियों के बीच पहुचाने का श्रेय जिन शायरों को जाता है..राना साहब उनमे से एक हैं.

“खुद से चलकर नहीं ये तर्जे सुखन आया है, पांव दाबे हैं बुजुर्गों के तो ये फन आया है..”




उन्होने अपनी बेहतरीन रचनायें सुनाकर श्रोताओं को सराबोर कर दिया..कुछ शेर मैं यहाँ दे रहा हूँ..
“सियासत किस हुनर मंदी से सच्चाई छुपाती है,
जैसे दुल्हन कि सिसकियों को शहनाई छुपाती है।
चाहती है कुछ दिन और माँ को खुश रखना,
ये बच्ची कपङों से अपनी लम्बाई छुपाती है।

उनकी यह रचना भी सराही गई-

ये सर बुलंद होते ही शाने से कट गया,
मैं मोहतरम
हुआ तो जमाने से कट गया।
इस पेङ से किसी को शिकायत नहीं थी,

यह पेङ तो बीच में आने से कट गया।


उन्हे सुनना गुलशन की सैर करने जैसा था..जिसमे अलग-अलग बू के कई रंग खिले हैं.
उन्होंने सिंधु नदी पर अपनी प्रसिद्ध कविता भी पढी...

“यह नदी गुजरे जहाँ से समझो हिन्दुस्तान है”

और माँ कि महानता को इन शब्दों मे व्यक्त किया।

“बुलंदियों का बङे से बङा निशान हुआ,
उठाया गोद में माँ ने तो आसमान हुआ”

जिन्दगी भर हमने यूँ खाली मकां रहने दिया,
तुम गये तो दूसरे को कब यहाँ रहने दिया।

बनावटी और खोखले व्यवहार पर उन्होने लिखा है...

“मैं फल देखकर लोगों को पहचानता हूँ,
जो बाहर से ज्यादा मीठे हों, अंदर से सङे होते हैं।“


अभिनेता राजबब्बर ने भी राना साहब की कुछ गजलें अपने खास अभिनय अन्दाज मे पढी..




”मियां मैं शेर हूँ शेरों कि गुर्राहट नहीं जाती,
लहजा नर्म भी कर लूं तो झुंझलाहट नहीं जाती”।

कवि प्रदीप चौबे की कविअताओं से हंसी के ठहाके लगते रहे..





हसन काज़मी साहब ने बेहतरीन शेर पेश कर अपनी उपस्थिती दर्ज कराई, अपने इस शेर से उन्होने लोगों तक अपनी बात पहुंचाई....


”क्या जमाना है कभी यूं भी सजा देता है,
मेरा दुश्मन मुझे जीने की दुआ देता है.

“गांव लौटे शहर से तो सादगी अच्छी लगी,
हमको मिट्टी के दिये की रोशनी अच्छी लगी”

अलीगढ से आयीं युवा शायरा मुमताज नजीम की गजलों ने श्रोताओं को मदहोश कर दिया, उन्होने कहा..
“तेरा हुक्म हो तो तमाम शब मैं तेरे सिरहाने खडी रहूं,
अगर तू कहे तो जिन्दगी तेरे पायताने गुजार दूं ।


“जब से इकरार कर लिया हमनें,

खुद को बीमार कर लिया हमनें,

अब तो लगता है जान जायेगी,

तुमसे जो प्यार कर लि
या हमने ।

मदन मोहन दानिस की रचनाओ ने भी श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया..

कार्यक्रम के संचालन की बागडोर डा. कुमार विश्वास जी के हाथों मे थी...उनका सफल संचालन और काव्य पाठ सुनने देखने का मौका पहली बार मुझे मिला..बडा अदभुत अनुभव रहा.




प्रोग्राम के डिजाइन से सम्बन्धित कार्य मेरे जिम्मे था.. आमंत्रण पत्र, बैकड्राप, मिमेंटो और एक शार्ट फिल्म.. जिसके लिये अपनी एक कलाकृति चुनी..और काफी हद तक सफल रहा. कभी सोचा भी नहीं था कि राना साहेब के इस प्रोग्राम पर मेरा एक अहम किरदार होगा.. बडे सम्मान की बात है मेरे लिये.. कि मैने उन पर काम किया. रिसोर्स कम थे.. और समय भी... 3 दिन की मेहनत और आखिरी 8 घंटे का काम करना काफी सफल रहा.. प्रोग्राम शुरू होने से मात्र 30 मिनट पहले डा. कुमार को यह फिल्म सौपी गयी..



9 मिनट और 38 सेकंड की यह फिल्म डी.वी.डी. क्वालिटी की है. जिसे प्रोजेक्टर पर देखा जा सकता है. इसे यहाँ दे रहा हूँ..उम्मीद है आप सभी को यह प्रयास पसन्द आयेगा.



-विज
www.vijendrasvij.com

Thursday, September 20, 2007

गजल बीती-एक शाम मुनव्वर राणा के नाम


एक शाम मुनव्वर राणा साहेब के नाम..
23 सितम्बर 2007, क़ृभको आडिटोरियम,
ए-10, नोयडा, समय शाम 6 बजे.
आप सभी सादर आमंन्त्रित हैं.


Tuesday, August 21, 2007

इक पगली लडकी के बिन, कविता संग्रह, डा. कुमार विश्वास

इतनी रंग बिरंगी दुनिया,
दो आंखो मे कैसे आये..
हमसे पूछो, इतने अनुभव
एक कंठ से, कैसे गाये.....
...तब इक पगली लडकी के बिन
जीना गद्दारी लगता है...

डा. कुमार विश्वास, नई पीढी के पसन्दीदा कवि और गीतकार हैँ..इनका नाम किसी परिचय का मोहताज नही है...अभी हाल ही मे ही उनका एक कविता संग्रह “कोई दीवाना कहता है” हिन्द प्रकाशन द्वारा प्रकाशित हुआ था..और अब पुन: उनका दूसरा एक संग्रह “इक पगली लडकी के बिन” रवि प्रकाशन ने प्रकाशित किया है...दोनो किताबो के कवर पृष्ठ मेरे द्वारा डिजाइन किये गये है.. जिन्हे यहाँ आप देख सकते है.. कविता संग्रह बाजार मे आसानी से उपलब्ध है...

Tuesday, August 14, 2007

जश्न-ए-आजादी

जश्न-ए-आजादी..
मुबारक हो..

Monday, August 13, 2007

नागार्जुन-साहित्य पर एक चित्र

बादल को घिरते देखा है।


अमल धवल गिरि के शिखरों पर,
बादल को घिरते देखा है।
छोटे-छोटे मोती जैसे
उसके शीतल तुहीन कणों को,
मानसरोवर के उन स्वर्णिम
कमलों पर गिरते देखा है,
बादलों को घिरते देखा है।
तुंग हिमालय के कंधों पर
छोटी बड़ी कई झीलें हैं,
उनके श्यामल नील सलिल में
समतल देशों से आ-आकर
पावस की ऊमस से आकुल
तिक्त-मधुर बिसतंतु खोजते
हंसों को तिरते देखा है।
बादल को घिरते देखा है।

- नागार्जुन

ग्राफिक्स-विज

Tuesday, August 07, 2007

मैने जीवित व्यक्तियो के पोट्रेट्स नही बनाये...

आज से लगभग 13-14 बरस बहले (सन-1993) मै इलाहाबाद संग्रहालय पहली बार गया था....पहली बार इतनी कलाकृतियाँ देखने को मिली...उन्ही मे से एक नेहरू का पोट्रेट भी था .. आयल कलर , आन बोर्ड , काफी बडा और जाने कौन सी टेक्नीक से बना...उस समय मुझे आयल कलर और टेक्नीक का इतना ज्ञान नही था...

पोट्रेट बनाने की प्रेरणा मुझे उसी चित्र से मिली....नेहरू जी के उस पोट्रेट ने मुझे 20-सो बार संग्रहालय आने पर मजबूर कर दिया... तब तक वीथिका संरक्षको द्वारा उस टेक्नीक के बारे मे भी परिचित हो चुका था..चित्र आयल कलर मे था और बिना कूची का इस्तेमाल किये हुए , नाइफ (एक चाकू जो स्पेशली पेन्टिग के लिये होता है) से बना था. ..बडा ही आश्चर्य और मन मे कौतुहल बना रहता.. क्या सालिड इफेक्ट्स था वाकई...करीब 2-3 बरस के मानसिक तनाव के बाद 1996 मे हमने एक दिन...स्केच बुक से एक पेज निकाला गाँधी के कई चित्र ड्रा किये...एक फाइनल हुआ... आयल कलर के बारे मे ज्यादा ज्ञान नही था....हाँ स्टूडेंट क्वालिटी का कैमेल वाटर कलर रखे थे ..उसी से एक्स्पेरीमेंट करना शुरू किया...वह भी सब्जी काट्ने वाले चाकू से...परिणाम चौकाने वाले थे..सस्ते वाटर कलर से एसा इफेक्ट देख तो आनन्द ही आ गया.

और इस तरह तैयार हुआ यह गाँधी का पोट्रेट....फिर 3-4 दिन बाद नेहरू का....और करीब एक साल बाद (1997) मे मेरा वह आखिरी पोट्रेट मेरी अपनी 5 बरस की बहन ‘रोशनी’ का था......


गाँधी-12 x 17, इंच, वाटर कलर, नाइफ, पेपर-1996

नेहरू -12 x17, इंच, वाटर कलर, नाइफ, पेपर-1996

रोशनी -12 x17, इंच, वाटर कलर, नाइफ, पेपर-1997

बस यही 3 सबूत है मेरे पास की मैने भी कभी पोट्रेट बनाये थे...और आज 10 बरस हो गये....


-विज

Monday, July 09, 2007

सृजन शिल्पी के सवाल मेरे जवाब...

आज सृजनशिल्पी जी की पोस्ट “कला, कलाकार और कल्पना" href="http://srijanshilpi.com/?p=131">कला, कलाकार और कल्पना” पढी...
बडा ही सकरात्मक लेख है...
अभी पिछले हफ्ते उनसे गूगल पर बातचीत हुई...जिसके कुछ अंश उन्ही से इजाजत लेकर यहाँ दे रहा हूँ...कला, कलाकार और उसकी कल्पना के बारे मे उन्होने मुझसे कुछ दिलचस्प सवाल किये...जिनके उत्तर मै यहाँ लिख रहा हूँ....कितनी सफलता मुझे मिली है...वह तो आप ही बता सकेगे...


srijanshilpi: अपने अगले लेख के संदर्भ में, आपकी एक टिप्पणी चाहता हूं

srijanshilpi: कलाकार, अपनी कला में यथार्थ और कल्पना के बीच समन्वय किस प्रक्रिया के तहत करता है
12:08 PM आप इस प्रश्न को अपने हिसाब से समझ सकते हैं

12:09 PM srijanshilpi: और अपने अनुभव से कुछ बताइए

srijanshilpi: किताबी संदर्भ तो मेरे पास पर्याप्त है

12:11 PM srijanshilpi: जैसे किसी बच्चे या फूल को हम रोज देखते हैं और उसे सामने देखकर वैसी कोई प्रतिक्रिया हमपर नहीं होती जो उसी बच्चे या फूल या दृश्य की पेंटिंग को देखकर होती है तो कलाकार यथार्थ में ऐसा क्या और कैसे जोड़ता है जो उसे एक कला में रूपांतरित कर देता है
srijanshilpi: इस सप्ताहांत तक मेरे प्रश्न के संदर्भ में यदि आप कुछ प्रकाश डाल सकें तो उसे अपने लेख में समाहित करने का प्रयास करूंगा

बडे ही दिलचस्प सवाल है आपके, इससे आपकी कला मे गहरी दिल्चस्पी का भी पता लगता है....
आपके प्रश्नो के उत्तर देने की मेरी एक कोशिश भर है....

“कलाकार, अपनी कला में यथार्थ और कल्पना के बीच समन्वय किस प्रक्रिया के तहत करता है”

मेरी नजर मे कोई विषेश व्यक्ति ही कलाकार नही होता...( यहाँ जब बात चल रही है चित्रकला से सम्बन्धित है तो मै चित्रकार के बारे मे कर रहा हूँ..)

”कलाकार तो सभी होते है...सजीवो मे सृजन करने और व्यक्त करने की क्षमता होती है....फर्क सिर्फ इतना है कि किसी का गोला गोल, तो किसी का गोला चौकोर होता है....यदि रियाज किया जाये तो चौकोर गोला भी गोल हो सकता है...”

यथार्थ, को सामने रखकर ही कुछ कल्पनाये की जाती है...जैसे कभी भी कोई चीज सम्पूर्ण नही होती और हम उसकी सम्पूर्णता के लिये कल्पनाये करते है...हाँ यह जरूरी नही कि हमारी कल्पनाओ को सही दिशा मिल जाये..

एक चित्रकार की भी यही कोशिश होती है कि वह कल्पनाओ को उनका ही एक आकार दे सके, अपनी दृष्टि दे सके..... एक आइना दे सके...फिर हम उन रोज मर्रा की चीजो को उसकी नजर से देखते है तो वह खास बन जाती है..खूबसूरत लगने लगती है..और हम अनायास ही उन्हे देख कर कुछ कह उठते है....या यह कहेँ प्रतिक्रियाये जन्म लेती है...

srijanshilpi: जैसे किसी बच्चे या फूल को हम रोज देखते हैं और उसे सामने देखकर वैसी कोई प्रतिक्रिया हमपर नहीं होती जो उसी बच्चे या फूल या दृश्य की पेंटिंग को देखकर होती है तो कलाकार यथार्थ में ऐसा क्या और कैसे जोड़ता है जो उसे एक कला में रूपांतरित कर देता है....

मेरे खयाल से आपके इस प्रश्न के भी मै करीब आ गया हूँगा...

”ठीक वैसे ..जैसे हम किसी चीज कैलेंडर को देखते है..या कोई फोटो...या जैसा आपने कहा..किसी बच्चे , फूल को देखते है... जो हू...बहू दिखे...हम पर वाकई कोई विषेश प्रतिक्रिया नही होती...बनिस्पत अगर हमे उसकी पेंटिंग को देख होती है...तो यहाँ भी वही बात है.. हम यथार्थ को कल्पनाओ के साथ देखते है...और अपनी दृष्टि देते है.. हममे उस पेंटिंग को देख स्रज़नात्मक् क्षमता, कल्पनाये और दृष्टिकोण एकसाथ मिल जाते है..तभी शायद प्रतिक्रियाये जन्म लेती होंगी....

चित्रकार यथार्थ के उन पहलुओ को उजागर करता है जिन्हे हम देख नही पाते या देखने की कोशिश नही करते..या देख कर भी अनदेखा कर देते है....और फिर् हम उन्ही चीजो को चित्रकार की नजर से देखते है...या किसी कलाकृति के माध्यम से देखते है.. तो उन मामूली सी दिखने वाली चीजो मे भी खूबसूरती नजर आती है....क्यूँकि तब हम उनके सभी पहलुओ को एकसाथ देख पाते है..

“क़ूडे के ढेर से सिर्फ बदबू ही आती है... यह यथार्थ है...
क़ूडे के ढेर से सिर्फ बदबू ही नही आती है.. और भी कुछ होता है... यदि उन्हे आकार दे तो ...वह खूबसूरत लगेगी...... यह एक कोरी कल्पना है....

“आपने चित्रकार की नजर से कचरे का ढेर देखा.... उस कचरे मे बडी सारी चीजे थी...जैसे सडे कागज, खाना, बरसाती ...पुरानी घिसी पिटी चप्पल.......
अहा, क्या रंग है चप्पल का.... शायद हवाई चप्पल है... गुलाबी रंग की होती तो और खूबसूरत लगती....अभी पूरी टूटी नही......जुडी होती या फिर पूरी टूटी होती तो और भी खूबसूरत दिखती....अरे, कूडे के ढेर को यहाँ से देखो .....नीला आसमान साफ नजर आ रहा है उसके बैकग्राउंड् मे....और डूबते हुए सूरज की हल्की रोशनी टूटे चप्पल पर भी पड रही है...सुनहला लगने लगा है.... कचरे का ढेर तो एक विशाल पहाड जैसा.. ..क्या चित्र बन रहा है... चलो फिर मन मे इसे एक आकार देते है....क्या गजब का चित्र बना है...”
शायद, ऐसे ही रची जाती होंगी कलाकृतियाँ....

"लियनार्दो की मोनालिसा भी ऐसे ही रची गई होगी...
क्या थी, एक जीती जागती हमारी ही जैसी आँख नाक पैर वाली आम इंसान ही...तो हम क्युँ न् देख सके उसकी खूबसूरती को.. लियनार्दो ने ही क्यो देखा...उसी ने हमे उसकी खनकती/ मुस्कुराती हँसी दिखाई...उसकी मुस्कुराहट् का राज, उसकी आंखो की गहराई...और वह तमाम अनदेखे पहलू भी दिखाये थे...मोनालिसा कोई भी हो सकती है... अभी भी यहाँ हो सकती है...फर्क यही है कि हम उसे देख नही पा रहे... बरसो पहले ही दिखी थी लियनार्दो को... हमे फिर से दिख सकेगी..यदि हम यथार्थ के साथ अपनी कल्पनाओ के रंग भर देंगे."



यह मेरे अपने व्यक्तिगत विचार है..मेरी अपनी सोच... दावा नही....सभी की अपनी-अपनी विचारधाराये हो सकती है.....उम्मीद है, आपके पूछे गये प्रश्नो के उत्तर मिल गये होंगे....
और, सच बात तो यह है कि इन सभी सवालो के जवाब... एक चित्रकार नही...उसकी कला के कद्रदान बखूबी दे सकते है......जिसने महसूस किया होगा...असल उत्तर वही होंगे.....

-विज

Friday, July 06, 2007

अक्सर, मौसमो की छत तले

किसी मौसम में
एक इतिहास
मैं भी रचना चाहता था...

कभी बारिश की
बून्दों की टपटप के बीच
तो कभी,
हरी, पीली, बसंती
सरसों के साथ....
और,
कभी लपकाती हुई तारकोली
दिल्ली की सड़कों में
आवारा बन....

हाँ,
एक मौसम चला था
मेरे साथ भी,
कुछ पल....
सर्द कोहरे की धुन्ध मे
लिपटा हुआ....

अलसाई हुई,
सुबहो के साथ
एक दिन,
करवट बदली थी इतिहास ने.....

अपनी कँपकपाती हुई
उंगलियों के बीच फँसी
उस अधजली सिगरेट के
दो कश लिए थे...बस
तभी,
दूर कहीं कोहरे में गुम
उसकी...
सफेद आकृति ने
करीब आकर साँस ली...
और,
कर गयी स्तब्ध....

ठगा सा देखता रहा
उसे, यूँ ही....
उंगलियों की जलन ने
आभास कराया मुझे,
मेरे अपने
वहाँ होने का....

कितने मौसमो की उम्र
साथ लिये...
जिये थे वह
हसीन से लम्हे
मैने...

अब तो,
पीले पत्तों का मौसम
जा चुका है.....
बावजूद इसके....
कभी बन ना सका मै,
उसके प्रेम का
कोई भी एक हिस्सा...

और,
दूर खड़े देखता रहा
बस यूँ उसे,
किसी और का इतिहास बनते....

अक्सर,
मौसमो की छत तले
आज भी वह,
बेहद याद आती है......

-विज
( नवम्बर 2004. मे लिखी गयी एक पुरानी कविता)

Friday, June 29, 2007

लाल बत्तियोँ मे साँस लेता एक वक्त

अक्सर देखता हूँ
वक्त को..
अपने नन्हे हाँथ फैलाये
दिल्ली की लाल बत्त्तियो पर...

यह..कभी कभी
साल मे दो-चार बार
तिरंगे झंडे को बेचकर भी
दो-वक्त की रोटी का जुगाड करता
दिख जाता है...

और कभी..
फटे चीथडो मे लिपटा...
फुटपाथ से चिपटा
दिख ही जाता है...

एक दिन तो मेरे करीब आकर बोला..
बाबूजी,
बस एक रुपया दे दो..
दो-दिन से कुछ खाया नही..

कभी...किसी दिन
यह शनि बन जाता है..
और थाम लेता है
सरसो के तेल से भरा एक कटोरा
अपने नन्हे हाथो मे...
और,
निकल पडता है
हमे शनि के शाप से
मुक्त करने....

यह हमेशा चलता रहता है..
कभी थकता भी नही..
इसके सोने और जागने का भी
कोई हिसाब नही रखता...

शायद...
यह हमेशा ऐसे ही चलेगा..
यह अक्सर दिखेगा..
कही...किसी भी लाल बत्ती पर..

और,
हम तमाशबीन बने दूर खडे..
इस वक्त को भी..
सिर्फ,
आते जाते ही देखते रहेंगे..

लोग कहते तो है
वक्त के साथ शायद....
सब कुछ बदल जाता है..
पर यह वक्त तो कभी नही बदला.....

-विज
( सितम्बर 2005. मे लिखी गयी एक पुरानी कविता)

Saturday, June 09, 2007

मै बंजारा, वक्त के कितने शहरो से गुजरा हूँ

मै बंजारा,
वक्त के कितने शहरो से गुजरा हूँ
लेकिन,
वक्त के इक शहर से जाते जाते
मुडके देख रहा हूँ
सोच रहा हूँ
तुमसे मेरा ये नाता भी टूट रहा है
तुमने मुझको छोडा था जिस शहर मे आके
वक्त का अब वो शहर भी मुझसे छूट रहा है..


जावेद अख्तर साहेब की यह नज्म मुझे बेहद अच्छी लगती है..बडा सुकूँन देती है आज भी..जब हम अपने उन शहरो को याद करते है..जिन्हे पीछे छोड आये..मेरे खयाल से मै ही नही.. मेरे जैसे कितने ही लोग होंगे जिन्होने शहर दर शहर बद्ले होगे..और हर शहर ने उन्हे कुछ न कुछ जरूर दिया होगा..उन्हे यह नज्म अपने ही दिल की एक जबान जरूर लगती होगी.. साढे छ: बरस पहले मै जब इलाहाबाद छोड दिल्ली आया था..तब उस्ताद शायरो, कवियो की शायरी और कविताओ के साथ जुगलबन्दी किया करता था..यह चित्र भी मेरी जुगलबन्दी का एक हिस्सा है..
महज छ: बरस पुराना...

-विज
http://www.vijendrasvij.com

Friday, June 01, 2007

त्रिनिदाद में हिन्दी का स्वाद--अशोक चक्रधर

कितना आनंदकारी होता है सुदूर देशों में वहां के निवासियों और प्रवासियों से हिन्दी सुनना। अपने देश में ही हिन्दी के विभिन्न रूपों की कमी नहीं है, जब बाहर जाते हैं तो हिन्दी की ध्वनियां और भी लुभावनी हो जाती हैं। पहली बार जब मॉरिशस गया था तब जो हिन्दी सुनी, बहुत निराली थी। जीवन की मिक्सी-ग्राइंडर में भोजपुरी, फ्रेंच, अंग्रेज़ी, और क्रियोल को डालकर घुमाने के बाद ऐसी भाषा निकली जो जहां-तहां ही समझ में आती थी, पर लगती थी मीठी और अनूठी।


पांच बरस पहले त्रिनिदाद जाने का मौका मिला। मिला भी कैसे? बताता हूं। भूमिका में आत्मश्लाघा लगे तो क्षमा करिएगा। हुआ यूं कि अचानक हिन्दी जगत में कुछ ऐसी हवा फैली कि अशोक चक्रधर नाम का जामिआ मिल्लिआ इस्लामिया का हिन्दी का प्रोफेसर इन दिनों काफी कम्प्यूटर-कम्प्यूटर खेल रहा है। लैपटॉप, प्रोजैक्टर और पर्दा लेकर कुछ ऐसी चीज़ें दिखाता फिर रहा है जिससे पता चलता है कि कम्प्यूटर में हिन्दी किस रफ्तार से प्रवेश पा रही है।

मैं कम्प्यूटर की आंतरिक तकनीक के बारे में अधिक नहीं जानता था, लेकिन ये सच है कि हिन्दी से जुड़े सॉफ्टवेयर्स का अच्छा प्रयोक्ता बन चुका था। माइक्रोसॉफ्ट कम्पनी ने सन 2000 में जब ऑफिस 2000 बाज़ार में उतारा तब पॉवर-पाइंट का प्रयोग करते हुए मैंने उनके लिए जो प्रस्तुतियां बनाईं और जगह-जगह दिखाईं उससे हिन्दी के उन हल्कों में, जहां सूचना प्रौद्योगिकी की प्यास थी, मेरी अच्छी-खासी पूछ होने लगी। कोई चीज़ थी ‘यूनिकोड’, जिसका बड़ा हल्ला था। माइक्रोसॉफ्ट के सॉफ्टवेयर इंजीनियर समझाते थे कि भाषाई कम्प्यूटिंग के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव आ जाएगा। अब तो यूनिकोड की महत्ता सब जानते हैं लेकिन मैं सन 2000 में ही उसका नया-नया मुल्ला बन गया था। अपने सद्य:ज्ञान से हिन्दी प्रेमियों को यूनिकोड की महत्ता समझाता था। पर हाय! उन दिनों कंप्यूटर में यूनिकोड तब तक सक्रिय नहीं होता था जब तक कि ऑपरेटिंग सिस्टम भी विंडोज़ 2000 न हो। और हिन्दी के अधिकांश लोग बमुश्किल तमाम विंडोज़ 98 पर ही अटके हुए थे। विंडोज़ एक्सपी के बाद तो कोई कठिनाई ही न रही। जब त्रिनिदाद से बुलावा आया तब मैं विंडोज़ एक्सपी का भरपूर उपयोग कर रहा था। माइक्रोसॉफ्ट के लोग मुझे अपने हिन्दी उत्पादों का पहला प्रयोक्ता घोषित करते थे। त्रिनिदाद से बुलावा कब और कहां आया, ये भी सुनिए।

मैं माखन लाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित भाषाई कम्प्यूटिंग पर आधारित एक सेमिनार में भाग लेने के लिए भोपाल गया हुआ था। वे दिन बड़े मज़ेदार थे। कम्प्यूटर ज्ञाताओं को हिन्दी अधिक नहीं आती थी और हिन्दी-वादियों का कम्प्यूटर से भला क्या लेना-देना। हम चार-पांच गिने-चुने ही लोग थे, जैसे प्रो. सूरजभान सिंह, डॉ. विजय कुमार मल्होत्रा, डॉ. वी. रा. जगन्नाथन, हेमंत दरबारी, जो हर सभा-संगोष्ठी में दिख जाते थे। डॉ. वी. रा. जगन्नाथन के साथ मिलकर मैं जिस समय एक पॉवरपाइंट प्रस्तुति पर काम कर रहा था, मेरे मोबाइल पर त्रिनिदाद से डॉ. प्रेम जनमेजय का फोन आया— ‘दोस्त! त्रिनिदाद आना है। हम यहां सत्रह से उन्नीस बीस मई के बीच अंतरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन आयोजित कर रहे हैं। सम्मेलन में एक पूरा सत्र हमने सूचना प्रौद्योगिकी पर रखा है। इन दिनों तुम्हारे खूब हल्ले सुनने में आ रहे हैं। आ जाओ डियर! एक धांसू कविसम्मेलन भी रखेंगे। भारतीय उच्चायोग के साथ हमारी यूनिवर्सिटी, जहां मैं पढ़ा रहा हूं, मिलकर ये आयोजन कर रहे हैं। हिन्दी विद्वानों और साहित्यकारों के नाम तय हो चुके हैं, तुम्हारा सारा खर्चा हम उठाएंगे। मैंने यहां तुम्हारी काफी हवा बना दी है कि बंदा बड़ी मुश्किल से मिलता है, बहुत बिज़ी रहता है, कविसम्मेलनों के ज़रिए बहुत कमाता है, ऐसे फोकट में नहीं आएगा। तो मैंने तुम्हारे लिए एक हज़ार डॉलर की अलग से व्यवस्था भी कराई है... लेकिन डियर, किसी को बताना मत’।

मैं मोबाइल ले कर कमरे से बाहर आ गया, कहीं वी. रा. जगन्नाथन ही न सुन लें, शायद जा रहे हों। अन्दर-अन्दर मैं बेहद खुश। एक फोन पर सब कुछ तय हो गया। बाहर से अन्दर आया, यह दिव्य समाचार पचा नहीं पाया। जगन्नाथन जी को बताया तो ज्ञात हुआ कि वे त्रिनिदाद जा चुके हैं। वहां हिन्दी पढ़ा चुके हैं। मैं और खुश, ये हुई सोने पर सुहागे वाली बात। त्रिनिदाद में अपना नक्शा जमा सकूं इसके लिए संयोग देखिए कि वहां का नक्शा मनुष्य शरीर में मेरे सामने ही बैठा है। मैंने प्रोफेसर से कहा— ‘प्रस्तुति तो अपनी लगभग तैयार है जगन्नाथन जी! आप ज़रा त्रिनिदाद के बारे में बताइए’। उन्होंने बताया-- ‘त्रिनिदाद के लोग हिन्दी फिल्मी गीतों के बड़े दीवाने हैं और एक म्यूज़िक चलता है वहां, चटनी’। उदारमना प्रोफेसर ने दिल्ली आने पर मुझे चटनी संगीत के छ: ऑडियो कैसेट दिए। अपनी कार में भरपूर सुने मैंने। क्रीस रामखेलावन की स्किनर पार्क की त्रिनिदाद स्टाइल चटनी, सॉसी रामरजी की चटनी, चटक-मटक चटनी, गुलारी के फूल, जानीया जानीया चटनी और बाबला कंचन की मानूं ना मानूं ना चटनी। साद्रो की अफ्रीकन रिद्म और नरेश प्रभू की ढोलक।
कुछ नमूने बताता हूं—

‘मैं तो जाऊंगी अकेला, मैं तो लागी तेरी हो, मैया, जाऊंगी अकेला’।

‘होलीया सताए रे, आए ना बलमवा। पहली बुलाव ससुर मोरे ऐले, लागेला सरमवा नजरिया घुमैले। आए ना बलमवा’।

‘ना रही सै छांव मंगलवा, झारू सै झारै अंगनवा। उसपे बैठे न बा, कैसे के मारो नजरिया। झारू सै झारै अंगनवा।

त्रिनिदाद में हवाई अड्डे से जिस कार में हम होटल की ओर जा रहे थे उसमें बज रहा था वही कैसेट। भोजपुरी चटनी संगीत-- ‘मैं तो जाऊंगी अकेला...’। मॉरिशस की हिन्दी से अलग प्रकार की हिन्दी। भोजपुरी और अफ्रीकन भाषाओं का मिलाजुला रूप। बेहद कर्णप्रिय, बेहद लुभावना।

जहां ठहराया गया वह कोई होटल नहीं था। कोई व्यक्तिगत गैस्ट हाउस था। नाम था उसका— मॉर्टन। भरपूर हरियाली से घिरी एक सहज सी दुमंज़िला इमारत, जिसके ऊपर टीन की छत थी। छत को चारों ओर से घेरे हुए थे ऊंचे-ऊंचे वृक्ष। सामने एक छोटा सा चर्च। मॉर्टन का बड़ा सा अहाता। अन्दर जाने के लिए लोहे का स्लाइडिंग डोर और लोहे की ही सीढ़ियां।

गाड़ियों से प्रतिभागियों का सामान उतर रहा था। मेरे साथ डॉयमण्ड पब्लिकेशन के स्वामी नरेन्द्र कुमार थे। मैंने उनसे कहा— ‘सामान की फिक्र छोड़िए, कमरा देखते हैं अपने लिए बढ़िया सा। ऊपर ठहरेंगे हरियाली का मज़ा लेंगे’। मैं लोहे की सीढ़ियों पर खटा-खट ऊपर चढ़ गया। नरेन्द्र जी आराम से आए। सामने बाल्कनी में आरामकुर्सी पर बैठी थीं हंगरी से आई हुई डॉ. मारिया नेज्येशी। मैं उनसे परिचित था। उनके सामने रखी मेज़ पर चाय की केतली थी और बिस्कुट की प्लेट। मिलकर खुश हुईं। प्यार से हम दोनों को बिठाया। स्वयं किचिन से कप लेकर आईं। ऐसा स्नेहिल व्यवहार था कि हम भला चाय के लिए कैसे मना करते। मैंने पूछा— ‘यहां कौन सा कमरा अच्छा है मारिया जी’? वे बोलीं— ‘ऊपर एक-दो कक्ष खाली हैं, लेकिन बताया गया है कि ऊपर सिर्फ महिलाएं रुकेंगी। मॉरिशस से डॉ. रेशमी रामधुनी आने वाली हैं और भारत से भी तो आपके साथ कुछ महिलाएं आई होंगी’।

इतना सुनने के बाद हमसे चाय न पी गई। धड़धड़ाते हुए नीचे आए। तब तक नीचे के सारे अच्छे कमरे लुट चुके थे। हमारे पल्ले पड़ा एक टुइयां सा नौ बाई नौ का कमरा। नरेन्द्र जी मेरे प्रकाशक थे और मैं उनका लेखक। मित्रता ऐसी की रॉयल्टी का मामला कभी आड़े नहीं आया। लॉयल्टी बनी हुई थी एक-दूसरे के प्रति। विमान में ही तय कर चुके थे कि एक साथ ठहरेंगे। हिस्से में आया ये नौ बाई नौ का दड़बा। मज़े की विडम्बना ये कि अन्य प्रतिभागियों की तुलना में हम दोनों के पास सामान ज़्यादा था। उनके पास किताबों के बड़े-बड़े बंडल और मेरे पास लैपटॉप, प्रोजैक्टर और तकनीकी तामझाम। उन दिनों एल.सी.डी. प्रोजैक्टर इतने आम नहीं हुए थे। मैं अपनी रिस्क पर जामिआ का प्रोजैक्टर लाया था।

कमरे में किताबों के गट्ठरों ने मेज़ का काम दिया और मेरे उपकरणों ने पलंग पर पार्टीशन का। स्थान कम था, हौसले बड़े थे। मैंने एक ही रात में अपना पॉवर-पाइंट प्रैज़ेंटेशन बनाया फिर नरेन्द्र जी के लिए दूसरा। सुबह-सुबह उन्हें प्रशिक्षित भी किया— ‘हिन्दी के प्रकाशक को हाई-टैक दिखना चाहिए नरेन्द्र जी! लीजिए, अब आपको कुछ नहीं करना है। बस, राइट ऐरो वाला बटन दबाते रहना है और बतियाते रहना है’। वे मुझ से अधिक उत्साह में थे।

मेरी अपनी प्रस्तुति पहले से ही लगभग तैयार थी। उसमें मुझे सिर्फ स्थानीय रंग भरना था। मॉर्टन के आसपास के कुछ चित्र अपने डिजिटल कैमरे से लिए। एक नज़ारा मेरे कैमरे को भाया। कंक्रीट और तारकोल की सड़क पर बीच-बीच में घास निकली हुई थी। मेरी प्रस्तुति को प्रस्थान-बिन्दु मिल चुका था। मैंने सोच लिया कि इच्छा-शक्ति का बीज यदि शक्तिशाली है तो नन्हा अंकुर कोमल धरती को ही नहीं सीमेंट और तारकोल को भी फोड़ कर बाहर आ सकता है।

आयोजन तीन दिन चलना था। उद्घाटन सत्र में त्रिनिदाद के प्रधानमंत्री और शिक्षा मंत्री मौजूद थे। प्रधानमंत्री यद्यपि अंग्रेज़ी में बोले लेकिन अपने भाषण में उन्होंने भौजी, दादी मां, का उल्लेख कई बार किया। ‘निमकहराम’— उन्होंने बताया कि यह शब्द राजनीति में हमारे यहां भी चलता है।

भारतीय दल के नेता थे सांसद श्री जगदम्बी प्रसाद यादव। उद्घाटन सत्र में उनका लिखित भाषण कई पन्नों का था। काफी बुज़ुर्ग थे वे। अटक-अटक कर धीरे-धीरे पूरा का पूरा भाषण पढ़ दिया। वहां के श्रोता और प्रतिभागी उबासियां लेने लगे। जब बताया गया कि अब इस भाषण का अंग्रेज़ी अनुवाद प्रस्तुत किया जाएगा तो भारत से गए प्रतिभागियों की मूर्छित हो जाने की इच्छा हुई होगी— ‘लीजिए अब फिर से वही सुनिए’। बहरहाल, स्थानीय तरुणियों के कत्थक नृत्य से राहत मिली। सभागार में ऊपर से लटकाए हुए, पेपरमैशी से बने, हिन्दी वर्णमाला के कुछ अक्षरों ने बालिकाओं को आशीष दिया होगा।

भारत सरकार की तरफ से भेजा गया प्रतिनिधि मंडल वहां के पांच-सितारा होटल में ठहरा था। विदेश सचिव श्री जगदीश शर्मा और जगदम्बी जी के साथ कुछ अन्य सरकारी अथवा सरकार-सम्मत लोग थे। सारे के सारे सत्रों में उस प्रतिनिधि मंडल में से उद्घाटन समारोह के बाद इक्का-दुक्का लोग ही दिखे लेकिन त्रिनिदाद में भारत के उच्चायुक्त श्री वीरेन्द्र गुप्ता लगभग हर सत्र में मौजूद रहे।

मेरी गुरुआनी डॉ. निर्मला जैन ने भाषा के सामाजिक पहलुओं पर चर्चा की तो श्री कन्हैया लाल नन्दन ने हिन्दी की विभिन्न विधाओं का परिचय दिया। डॉ. मधुरिमा कोहली का पर्चा दिलचस्प था। उन्होंने बताया कि विदेशी भाषा के रूप में हिन्दी को सीखने-सिखाने में क्या परेशानियां आती हैं। लंदन से आए पद्मेश ने हिन्दी और अन्य विदेशी भाषाओं के लिए शिक्षण-प्रविधियां बताईं।

हमारा सूचना प्रौद्योगिकी वाला सत्र हुआ तो उसके लिए दरकार थी एक अदद प्रोजैक्टर की। सभागार में पता नहीं कौन सा प्रोजैक्टर लगा था जो अंग्रेज़ी कार्यक्रम दिखाओ तो चलता था, हिन्दी आते ही बन्द हो जाता था। भला हुआ जो मैं अपना, यानी जामिआ का, प्रोजैक्टर ले गया। वही सी-डैक के हेमंत दरबारी के काम आया, उसी पर डॉ. कुमार महावीर ने अपनी प्रस्तुति दिखाई और उसी पर नरेन्द्र जी ने लैप-टॉप का इकलौता बटन दबा कर हिन्दी पुस्तकों के झण्डे गाड़ दिए।

एक सत्र हुआ जिसका शीर्षक था ‘हिन्दी ऐवरी व्हेयर’, इसमें डॉ. सुरेश ऋतुपर्ण ने जापान, मारिया ने हंगरी, अनिल शर्मा और तेजेन्द्र शर्मा ने लंदन (यू.के.), रेशमी रामधुनी ने मॉरिशस और अनुराधा जोशी ने गयाना में हिन्दी शिक्षण के अपने-अपने अनुभव बताए। एक पूरा सत्र तुलसी और कबीर के नाम था जिसमें डॉ. नरेन्द्र कोहली, गोविंद मिश्र, सूर्यबाला और डॉ. पुष्पिता ने बताया कि किस प्रकार मध्यकालीन कवियों की रचनाओं ने कैरेबियन देशों में हिन्दी का प्रचार-प्रसार किया। चटनी गीतों में नन्दलाल बेहद लोकप्रिय हैं—‘दधीया मोरी लै ले हो लै ले नन्दलाल’। ‘नन्दलाल’ के उच्चारण में अंग्रेज़ी की ध्वन्यात्मकता ज़रूर महसूस की जा सकती है।

डॉ. सिल्विया मूडी कुबला सिंह इस समारोह की मुख्य आयोजिका थीं। पतली-दुबली, छरहरी सौम्य-शांत स्वभाव की विदुषी। कविताएं लिखती थीं, पर अंग्रेज़ी में। प्रेम ने बड़े प्रेम से कविताओं का हिन्दी अनुवाद करने में उनकी सहायता की। वाणी इतनी मधुर की प्रेम ने उनका उपनाम ‘कोकिला’ रख दिया। श्यामलवर्णी मूडी को अपना नाम ‘कोकिला’ बहुत पसन्द आया। डॉ. दिविक रमेश और गिरीष पंकज की रचनाएं उन्होंने अपने पाठ्यक्रम के लिए मांगी। वे सब का भरपूर ध्यान रखती थीं।

यादों में बहुत चीज़ें घुमड़ रही हैं। प्रो. हरिशंकर आदेश का आश्रम, उनका पुस्तकालय, जहाजी चालीसा का विमोचन, चंका सीताराम का भव्य महल, समंदर के किनारे उनका शानदार बंगला, लहरों का शोर, मन्दिर की घण्टियां और अज़ान के स्वर, मनोहारी समंदर के तट, स्थान-स्थान पर क्रिकेट खेलते बच्चे, कमल के फूलों से सम्पन्न बॉटेनिकल गार्डन, रंग बदल कर लाल हो जाने वाले पक्षी, बाबा मौर्या का आम के पेड़ पर चढ़ना, नारियल का पानी, प्रतिभागियों की पिकनिक, चंका सीताराम के स्विमिंग पूल के किनारे विदाई समारोह के समय हल्की सी रिमझिम, न थमने वाले नृत्य, नरेन्द्र जी का पुस्तक विक्रेता, जर्जर हिन्दी भवन, दशहरा मैदान की पालकी, दो मंज़िला भवन जितनी ऊंची विवेकानंद की मूर्ति, प्रेम के घर के पिछवाड़े आम के पेड़, उनके दो प्यारे-प्यारे लड़ाकू पिल्ले, सिंह साहब की गार्मेंट्स की फैक्ट्री, ‘पिच लेक’ का काला दलदल. समुद्र के बीच बने मन्दिर पर लगे रंग-बिरंगे झंडे, बड़े-बड़े झुरमुटों में नन्ही-नन्ही चिड़िया, आकाश के बदलते रंग, उच्चायुक्त वीरेन्द्र गुप्ता के वृहत सरकारी निवास पर संगीत की महफ़िल, संदलेश और भारद्वाज जी की रैड वाइन और न जाने क्या-क्या।

बस एक बात और बताकर अपना फ़साना समाप्त करता हूं। अंतिम दिन हुए कवि-सम्मेलन में जहां लगभग सभी प्रतिभागियों ने अपनी कविताएं सुनाईं, संचालन मैंने किया। और अपनी शरारती कविताई से बाज़ नहीं आया। मैंने मंच पर बैठे-बैठे कुछ पंक्तियां गढ़ीं और श्रोताओं के कानों में जड़ दीं। मुझे ठहाकों और तालियों की ध्वनि अबतक सुनाई दे रही है। वे पंक्तियां थीं---
गुप्ता जी के प्रेम ने ऐसा किया कमाल,
सात-समंदर पार भी हिन्दी करे धमाल।
हिन्दी करे धमाल, तीन दिन बीते ऐसे,
जैसे भरे बज़ार, बीत जाते हैं पैसे।
कह चकरू चकराय, धन्य अपने जगदम्बी,
जब वे बोले, प्यारे मित्रो, सोए हम भी।

स्वर्ग में जगदम्बी जी भी मुस्करा रहे होंगे। न मुस्कराएं तो क्षमा करें।

ओहो! ये तो अपन त्रिनिदाद में ही अटक कर रह गए। टोबैगो के बारे में तो कुछ बताया ही नहीं, जहां प्रकृति में चुम्बक होती है। चलिए फिर कभी सही।


द्वारा: डॉ. अशोक चक्रधर की कलम से...